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फिल्म समीक्षा: इश्किया
02-04-10 01:06

अभिषेक चौबे की पहली फिल्म इश्किया मनोरंजक फिल्म है। पूर्वी उत्तरप्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के दो मुख्य किरदार मध्यप्रदेश केहैं। पुरबिया  और भोपाली लहजे से फिल्म की भाषा कथ्य के अनुकूल हो गई है। हिंदी फिल्मों में इन दिनों अंग्रेजी  का चलन स्वाभाविक मान लिया गया है। लिहाजा अपने ही देश की भाषाएं फिल्मों में परदेसी लगती  हैं। अभिषेक चौबे ने निर्भीक होकर परिवेश और भाषा का सदुपयोग  किया है। इश्किया वास्त व में हिंदी में बनी फिल्म है, यह हिंदी की फिल्म नहीं है।

खालू जान और बब्बन उठाईगीर हैं। कहीं ठिकाना नहीं मिलने पर वे नेपाल भागने के इरादे से गोरखपुर के लिए कूच करते हैं। रास्ते में उन्हें अपराधी मित्र विद्याधर वर्मा के यहां शरण लेनी पड़ती है। वहां पहुंचने पर उन्हें मालूम होता है कि विद्याधर वर्मा तो दुनिया से रूखसत कर गए। हां, उनकी बीवी कृष्णा हैं। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि खालूजान और बब्बन को कृष्णा के यहां ही रूकना पड़ता है। इस बीच कृष्णा, खालू जान और बब्बन के अंतरंग  रिश्ते बनते हैं। सब कुछ तात्कालिक है। न कोई समर्पण है और न ही कोई वायदा। सच तो ये है कि सारे किरदार स्वार्थी हैं और वे अपने हितों के लिए एक-दूसरे का इस्तेमाल करते हैं। शायद ऐसी ही है दुनिया।

इश्किया एक स्तर पर कृष्णा की भी कहानी है। पति ने उसे छोड़ दिया है। शरीर, मन और जीवन में भूखी कृष्णा को खालूजान  और बब्बन के स्वार्थ में भी स्नेह की ऊर्जा मिलती है। खालूजान और बब्बन ही उस पर आसक्त नहीं होते। कृष्णा भी शारीरिक संबंधों का बराबर आनंद लेती है। यह नए किस्म का चरित्रांकन है, जहां औरत पवित्रता की मू‌िर्त्त भर नहीं है। फिल्म के क्लाइमेक्स में पता चलता है कि अपने पति से बिफरी और नाराज कृष्णा घर में शरण लिए खालूजान  और बब्बन का इस्तेमाल करती है और अपने पति को लौटने के लिए मजबूर करती है। आखिरी दृश्य में वह झुलस गए पति पर तरस भी नहीं खाती। वह अपनी आजाद जिंदगी  के राह पर मनपसंद व्यक्तियों के साथ निकल जाती है।

अभिषेक चौबे और विशाल भारद्वाज ने फिल्म की चुस्त पटकथा में रोमांच बनाए रखा है। इस फिल्म की विशेषता है कि अगले  दृश्यों और प्रसंगों  का अनुमान नहीं हो पाता। चूंकि अनजाने किरदार हैं, इसलिए उनकी मनोदशा से दर्शक भी अनजान हैं। संवादों में धार और चुटीलापन  है। साथ ही इन संवादों में परिवेश की सामाजिक और राजनीतिकअर्थछवियां  हैं। दो व्यक्तियों के बीच जमीन-आसमान का फर्क हम सभी समझते हैं, लेकिन उनके बीच हिंदू-मुसलमान का फर्क बताना नया मुहावरा है। फिल्म के कई दृश्य संवादों और अभिनय से जानदार बन गए हैं। नसीरुद्दीन  शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन  की तिगड़ी नहीं होती तो फिल्म का क्या होता? अच्छी  फिल्मों की एक पहचान यह भी है कि उनके किरदारों में दूसरे कलाकारों की कल्पना नहीं की जा सके। कृष्णा की भूमिका विद्या के अलावा कौन कर सकता है?

नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन  ने मिल कर फिल्म को प्रभावशाली बना दिया है। विद्या सच कहती हैं कि वह कैमरे के आगे बेशर्म हो जाती हैं। उफ्फ, कैमरे से ऐसी अंतरंगता अब दुर्लभ हो गई है। विद्या बालन  ने बाडी लैंग्वेज और चेहरे के भावों से दृश्यों को सेक्सी बना दिया है। निर्देशक को अंग  प्रदर्शन की जरूरत ही नहीं पड़ी है। निश्चित ही ऐसे दृश्यों में साथी कलाकारों की ईमानदार सहभागिता  की दरकार रहती है।


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